एक ही पक्ष में रहकर, विरोधियों के साथ साथ अपनों के साथ भी वर्चस्व के लिए ओछी हरकतें करना, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को नजरअंदाज करना, उन्हें टेकन फॉर ग्रांटेड ले सभाओं में घंटों इंतजार करवाना, पब्लिक कनेक्ट न के बराबर रखना, सिर्फ अपने ऊपर के नेताओं की चापलूसी करना, फोटो और मीडिया कवरेज को प्राथमिकता देना, अपने क्षेत्र और अपनी मूल जिम्मेदारियों को अपनी प्रायोरिटी लिस्ट में आखिरी में रखना या न के बराबर रखना, पैसों/फंड्स का घोलमाल, ये सब किसी ना किसी रूप में, धीरे धीरे, ग्रेजुअली हार्डकोर समर्थकों के मन में भी खीज पैदा कर देता है। इनकी रीढ़ से ज्यादा इनकी जुबान और कार्यप्रणाली तन जाती है, और सेवा का संकल्प, सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाता है। केटली को याद रखना चाहिए कि आँच बंद होते ही उसकी गर्मी बर्फ होने में वक्त नहीं लगता।
ध्यान रहे कि यही लोग शीर्ष नेतृत्व और जनता/समर्थकों के बीच की कड़ी होते है। शीर्ष नेतृत्व तक अमूमन आम जनता सीधे पहुंच नहीं सकती। ऐसे लोगों की निष्कार्यप्रणाली से कट्टर समर्थक भी ठगा हुआ महसूस करते है जिसका सीधा असर उन्हें दी गई जिम्मेदारी निर्वाह करने की गुणवत्ता पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से होता है।
अंततः पक्ष और शीर्ष नेतृत्व को और खासकर समर्थकों को भुगतान करना ही पड़ता है।
वैसे गलती नेतृत्व की ज्यादा होती है क्योंकि नकेल कसने और नो नॉनसेंस अप्रोच दर्शाने में कहीं ना कहीं वे लोग कमतर रहते है। नीचे के नेताओं पर भी और प्रशासन पर भी। अफसर, प्रशासन, पदाधिकारी, नगरसेवकों की जवाबदेही (accountability), एक आधिकारिक 'रिपोर्ट कार्ड' जारी होना चाहिए। प्रशासनिक सुधार और पारदर्शी मॉनिटरिंग मैकेनिज्म को सशक्त करना टॉप प्रायोरिटी होनी चाहिए। आखिर जनता के विचार और उनकी धारणा; उनके साथ किस तरीके का व्यवहार हो रहा, उनकी बात और जज़्बात की समाधानकारक दखल हो रही है या नहीं इस पर निर्भर करता है।
सब कुछ देख कर, समझ कर भी वास्तविक परिस्थिति और चापलूस पदाधिकारी, नेताओं की खामियों को नजरअंदाज करने की भूल ना हो। हर पक्ष को इसका खामियाजा कभी ना कभी भुगतना ही पड़ता है। इससे बचा नहीं जा सकता। विलंब हो सकता है, ग्रेस पीरियड थोड़ा ज्यादा मिल सकता है, मगर होना निश्चित है।
हर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को ये ध्यान रखना चाहिए कि जिस पारंगत कुशलता से उन्होंने जन समर्थन और मजबूत आधार की नींव रखी है उसे बरकरार रखने के लिए उन्हें सभी हितधारकों को विश्वास में लेकर सकारात्मक और सुधारात्मक पहल करनी होगी।
शीर्ष पर बैठे लोगों के पास तो अक्सर संसाधन, विकल्प और सुरक्षा होती है मगर निष्ठावान समर्थक निस्वार्थ भाव से अपना समय, भावनाएं और कभी-कभी अपना पूरा जीवन उस विचार के लिए समर्पित कर देता है। इसलिए यदि निष्ठावान समर्थक सच्चाई का आईना दिखा रहे है तो उसे सहजता और सकारात्मकता दृष्टिकोण से ही स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि पक्ष के पतन का सबसे ज्यादा आघात उन्हीं पर और उन्हीं को होता है। और सबसे बड़ा राजनैतिक, मानसिक और भावनात्मक भुगतान उन्हें ही भोगना पड़ता है।
The blog writer is an Advocate and a Management Professional.
He is Ex President of "Consumer Justice Council", Secretary of "SARATHI", Member of "Jan Manch", RTI Activist and Ex Member of "Family Welfare Committee" formed under the guidelines of Hon. Supreme Court.
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