मित्र वो नहीं जो मिलने पर हाल चाल पूछें
मित्र वो, जो हाल चाल जानने के लिए मिले!
उपरोक्त दो पंक्तियों में "पहली पंक्ति" "औपचारिकता" और
"दूसरी पंक्ति" "आत्मीयता" की अनुभूति कराती है।
पहली, उन लोगों का परिचय करवाती है जो संयोग से या किसी काम से मिलने पर पूछ लेते हैं कि " कैसे हो?", "दिखते ही नहीं", "कहां गायब हो आजकल?", "कोई अता पता नहीं तुम्हारा?"
दूसरी, उन लोगों की जो आपके पास इसलिए नहीं आते क्योंकि वे रास्ते में मिल गए, बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ आपको देखने, सुनने और आपकी खैरियत जानने के लिए अपना समय निकालकर आते हैं।
यह खासकर तब ज्यादा प्रासंगिक महसूस होता है जब आप किसी व्यक्तिगत या पारिवारिक तकलीफ से जूझ रहे हो और ये वो लोग है जो आपकी दुविधा को भली भांति जानते है, जिनका आप के साथ उठना बैठना रहा हो और समय समय पर आपने खुद "दूसरी" पंक्ति वाली भूमिका का पूरी निष्ठा से निर्वाह किया हो उनके साथ!
मगर "दूसरी पंक्ति" वाला होना या वैसा व्यवहार करना या कर पाना हर किसी का चरित्र होना संभव नहीं है। काम हो तो दाम, वरना दूर से ही सलाम, आज के समय का मूलमंत्र बन पड़ा है। निश्चित ही यह दुर्भाग्यपूर्ण, मगर परम व्यावहारिक सत्य परिस्थिति है।
इसलिए हर किसी को मित्र समझने की खुशफहमी ना रखें तो बेहतर। हां, "हर कोई " में से अधिकांश "परिचित" निश्चित ही हो सकते है।
और जो अल्पांश रह गए वो "मित्र" की श्रेणी मे आ सकते है।
वित्तीय योजना (Financial Planning) की तरह भावनात्मक योजना (Emotional Planning) का सही प्रबंधन (management) आज के समय की ज्वलंत जरूरत है।
अतः अपना समय, भावनाएं और ऊर्जा, "मित्र" और "परिचित" का सही - सटीक मूल्यांकन कर, जानकर, मानकर और समझकर करें, क्योंकि समय, ऊर्जा और खासकर भावनाएं हमारे पास सीमित है।
मेल जोल, आना जाना, उठना बैठना, बात चित, शिष्टाचार सब से रखें मगर आत्मीयता "दूसरी पंक्ति" वाले मित्रों के लिए रिजर्व रखें।
" मित्रों " को मित्रता दिन पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
A beautifully penned piece.
ReplyDelete"Thank you very much. These thoughts came to mind after a rather unpleasant experience with a few friends during a challenging period."
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