Wednesday, October 28, 2026

राजनैतिक भुगतान

चाय से ज्यादा केटली गर्म के तर्ज पर जब अफसर, प्रशासन, छुटभैय्ये और नवनिर्वाचित नेता (अपवादों को सादर बख्शते हुए) भी अपने आप को शीर्ष नेतृत्व जैसे समझने लगते है तो पतन निश्चित है..देर - सवेर, ये अलग बात है।

एक ही पक्ष में रहकर, विरोधियों के साथ साथ अपनों के साथ भी वर्चस्व के लिए ओछी हरकतें करना, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को नजरअंदाज करना, उन्हें टेकन फॉर ग्रांटेड ले सभाओं में घंटों इंतजार करवाना, पब्लिक कनेक्ट न के बराबर रखना, सिर्फ अपने ऊपर के नेताओं की चापलूसी करना, फोटो और मीडिया कवरेज को प्राथमिकता देना, अपने क्षेत्र और अपनी मूल जिम्मेदारियों को अपनी प्रायोरिटी लिस्ट में आखिरी में रखना या न के बराबर रखना, पैसों/फंड्स का घोलमाल, ये सब किसी ना किसी रूप में, धीरे धीरे, ग्रेजुअली हार्डकोर समर्थकों के मन में भी खीज पैदा कर देता है। इनकी रीढ़ से ज्यादा इनकी जुबान और कार्यप्रणाली तन जाती है, और सेवा का संकल्प, सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाता है। ध्यान रहे कि यही लोग शीर्ष नेतृत्व और जनता/समर्थकों के बीच की कड़ी होते है। शीर्ष नेतृत्व तक अमूमन आम जनता सीधे पहुंच नहीं सकती। ऐसे लोगों की निष्कार्यप्रणाली से कट्टर समर्थक भी ठगा हुआ महसूस करते है जिसका सीधा असर उन्हें दी गई जिम्मेदारी निर्वाह करने की गुणवत्ता पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से होता है। केटली को याद रखना चाहिए कि आँच बंद होते ही उसकी गर्मी बर्फ होने में वक्त नहीं लगता।

अंततः पक्ष और शीर्ष नेतृत्व को और खासकर समर्थकों को भुगतान करना ही पड़ता है। 

वैसे गलती नेतृत्व की ज्यादा होती है क्योंकि नकेल कसने और नो नॉनसेंस अप्रोच दर्शाने में कहीं ना कहीं वे लोग कमतर रहते है। नीचे के नेताओं पर भी और प्रशासन पर भी। अफसर, प्रशासन, पदाधिकारी, नगरसेवकों की जवाबदेही (accountability), एक आधिकारिक 'रिपोर्ट कार्ड' जारी होना चाहिए। प्रशासनिक सुधार और पारदर्शी मॉनिटरिंग मैकेनिज्म को सशक्त करना टॉप प्रायोरिटी होनी चाहिए। आखिर जनता के विचार और उनकी धारणा; उनके साथ किस तरीके का व्यवहार हो रहा, उनकी बात और जज़्बात की समाधानकारक दखल हो रही है या नहीं इस पर निर्भर करता है। 

यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि सब कुछ देख कर, समझ कर भी वास्तविक परिस्थिति और चापलूस पदाधिकारी, नेताओं की खामियों को नजरअंदाज करने की भूल ना हो। हर पक्ष को इसका खामियाजा कभी ना कभी भुगतना ही पड़ता है। इससे बचा नहीं जा सकता। विलंब हो सकता है, ग्रेस पीरियड थोड़ा ज्यादा मिल सकता है, मगर होना निश्चित है। 

हर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को ये ध्यान रखना चाहिए कि जिस पारंगत कुशलता से उन्होंने जन समर्थन और मजबूत आधार की नींव रखी है उसे बरकरार रखने के लिए उन्हें सभी हितधारकों को विश्वास में लेकर सकारात्मक और सुधारात्मक पहल करनी होगी।

शीर्ष पर बैठे लोगों के पास तो अक्सर संसाधन, विकल्प और सुरक्षा होती है मगर निष्ठावान समर्थक निस्वार्थ भाव से अपना समय, भावनाएं और कभी-कभी अपना पूरा जीवन उस विचार के लिए समर्पित कर देता है। इसलिए यदि निष्ठावान समर्थक सच्चाई का आईना दिखा रहे है तो उसे सहजता और सकारात्मकता दृष्टिकोण से ही स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि पक्ष के पतन का सबसे ज्यादा आघात उन्हीं पर और उन्हीं को होता है। और सबसे बड़ा राजनैतिक, मानसिक और भावनात्मक भुगतान उन्हें ही भोगना पड़ता है।

The blog writer is an Advocate and a Management Professional.

He is Ex President of "Consumer Justice Council", Secretary of "SARATHI", Member of "Jan Manch", RTI Activist and Ex Member of "Family Welfare Committee" formed under the guidelines of Hon. Supreme Court.

Twitter Handle @amitgheda.


Saturday, August 1, 2026

"मित्र": शब्द एक, भ्रांतिया अनेक..

मित्र वो नहीं जो मिलने पर हाल चाल पूछें
मित्र वो, जो हाल चाल जानने के लिए मिले!

उपरोक्त दो पंक्तियों में "पहली पंक्ति" "औपचारिकता" और 
"दूसरी पंक्ति" "आत्मीयता" की अनुभूति कराती है।

पहली, उन लोगों का परिचय करवाती है जो संयोग से या किसी काम से मिलने पर पूछ लेते हैं कि " कैसे हो?", "दिखते ही नहीं", "कहां गायब हो आजकल?", "कोई अता पता नहीं तुम्हारा?"

दूसरी, उन लोगों की जो आपके पास इसलिए नहीं आते क्योंकि वे रास्ते में मिल गए, बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ आपको देखने, सुनने और आपकी खैरियत जानने के लिए अपना समय निकालकर आते हैं।

यह खासकर तब ज्यादा प्रासंगिक महसूस होता है जब आप किसी व्यक्तिगत या पारिवारिक तकलीफ से जूझ रहे हो और ये वो लोग है जो आपकी दुविधा को भली भांति जानते है, जिनका आप के साथ उठना बैठना रहा हो और समय समय पर आपने खुद "दूसरी" पंक्ति वाली भूमिका का पूरी निष्ठा से निर्वाह किया हो उनके साथ!

मगर "दूसरी पंक्ति" वाला होना, वैसा व्यवहार करना या कर पाना हर किसी का चरित्र होना संभव नहीं है। काम हो तो दाम, वरना दूर से ही सलाम, आज के समय का मूलमंत्र बन पड़ा है। निश्चित ही यह दुर्भाग्यपूर्ण, मगर परम व्यावहारिक सत्य परिस्थिति है।

इसलिए हर किसी को मित्र समझने की खुशफहमी ना रखें तो बेहतर। हां, "हर कोई "  में से अधिकांश "परिचित" निश्चित ही हो सकते है। 

और जो अल्पांश रह गए वो "मित्र" की श्रेणी मे आ सकते है।

वित्तीय योजना (Financial Planning) की तरह भावनात्मक योजना (Emotional Planning) का सही प्रबंधन (management) आज के समय की ज्वलंत जरूरत है। 

अतः अपना समय, भावनाएं और ऊर्जा, "मित्र" और "परिचित" का सही - सटीक मूल्यांकन कर, जानकर, मानकर और समझकर करें, क्योंकि समय, ऊर्जा और खासकर भावनाएं हमारे पास सीमित है।

मेल जोल, आना जाना, उठना बैठना, बात चित, शिष्टाचार सब से रखें मगर आत्मीयता "दूसरी पंक्ति" वाले मित्रों के लिए रिजर्व रखें।

" मित्रों " को मित्रता दिन पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

यह लेख ब्लॉग के लेखक की स्वरचित रचना है। इस पर लेखक का पूर्णाधिकार है। बगैर लेखक के अनुमती के कहीं भी प्रकाशित/पठन ना करें।

The blog writer is a Management Professional and operates a Manpower & Property Consultancy Firm. 

He is a Special Executive Officer - Government of Maharashtra, Ex President of "Consumer Justice Council", Secretary of "SARATHI", Member of "Jan Manch", RTI Activist, Ex Member of Family Welfare Committee formed under the guidelines of Hon. Supreme Court.

Twitter Handle @amitgheda.


राजनैतिक भुगतान

चाय से ज्यादा केटली गर्म के तर्ज पर जब अफसर, प्रशासन, छुटभैय्ये और नवनिर्वाचित नेता (अपवादों को सादर बख्शते हुए) भी अपने आप को शीर्ष नेतृत्व...