जात, पात, रंग, मजहब, राजनीति
से नहीं कोई सरोकार
मदिरा के द्वार, मदिरा लेते, एक होते, मनाते त्योहार..
फागुन की होली, है एक बहाना
मदिरा के द्वार, रोज दर रोज आना चाहे,
हर एक, मदिरा का दिवाना..
मुद्दतों बाद फिर हुए रूबरू वही अपने पुराने यार। चेहरों पर खिली रौनक दिल में जागा प्यार। समय के धूल की परत जो जमी थी बीते हुए हसीन लम्हों प...
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